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संपूर्ण हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य complete Hindi Sahitya important facts |
संपूर्ण हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य
इस आर्टिकल में हम संपूर्ण हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य complete Hindi Sahitya important facts की चर्चा करेंगे। इसमें हिंदी साहित्य के इतिहास के चारों काल खंडों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को एक जगह संकलित किया गया है।
हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की परंपरा
रामचंद्र शुक्ल – प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है ।आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही ‘साहित्य का इतिहास‘ कहलाता है।
हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की पद्धतियां
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की चार पद्धतियां है-
- वर्णानुक्रम पद्धति – गार्सा द तासी एवं शिवसिंह सेंगर
- कालानुक्रम पद्धति - ग्रियर्सन एवं मिस्र बंधु
- वैज्ञानिक पद्धति – गणपति चंद्रगुप्त
- विधेयवादी पद्धति – रामचंद्र शुक्ल
- कालानुक्रम पद्धति में लिखा जाने वाला प्रथम इतिहास ग्रंथ द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान ।
- विधेयवादी पद्धति के जनक हिप्पोलाइत तेन है। तेन का विचार है कि साहित्य का विकास तीन तत्वों जाति, वातावरण और क्षण अर्थात युग विशेष की ऐतिहासिक परिस्थितियों के वशीभूत होता है।
- रामचंद्र शुक्ल हिंदी के प्रथम विधेयवादी साहित्य इतिहासकार है।
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की स्रोत सामग्री
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा में प्रमुख रूप से पांच ग्रंथ आधारभूत सामग्री के रूप में प्रयुक्त किए गए हैं –
1. चौरासी वैष्णवन की वार्ता- इसके लेखक गोस्वामी गोकुलनाथ है। इसमें वल्लभाचार्य के 84 शिष्यों का वर्णन है।
2. दौ सौ बावन वैष्णवन की वार्ता- इसके लेखक गोस्वामी गोकुलनाथ है। इसमें विट्ठलनाथ के 252 शिष्यों का वर्णन है।
3. भक्तमाल- इसके लेखक नाभादास है। इसमें 200 राम भक्त कवियों का वर्णन है।
4. कालिदास हजारा – इसके लेखक कालिदास त्रिवेदी है।
5. गुरु ग्रंथ साहिब – इसके संकलनकर्ता सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव है।
हिंदी साहित्य इतिहास लेखन परंपरा के प्रमुख ग्रंथ
इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी | गार्सा द तासी | प्रथम भाग 1839 दूसरा भाग 1847 द्वितीय संस्करण 1871 |
तजकिरा ई सुअरा ई हिन्दी | मौलवी करीमुद्दीन | 1848 |
शिवसिंह सरोज | शिव सिंह सेंगर | 1883 |
द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ नॉर्दन हिंदुस्तान | जॉर्ज ग्रियर्सन | 1888 |
मिश्रबंधु विनोद | मिश्र बंधु | प्रथम तीन खंड 1913 चतुर्थ खंड 1934 |
हिंदी साहित्य का इतिहास | रामचंद्र शुक्ल | 1929 |
हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास | डॉ रामकुमार वर्मा | 1938 |
हिंदी साहित्य की भूमिका | हजारी प्रसाद द्विवेदी | 1940 |
हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास | हजारी प्रसाद द्विवेदी | 1952 |
हिंदी साहित्य का आदिकाल | हजारीप्रसाद द्विवेदी | 1952 |
हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास | डॉ गणपतिचंद्र गुप्त | 1965 |
हिंदी साहित्य का इतिहास | डॉ नगेंद्र | 1973 |
हिंदी साहित्य का वृहद इतिहास(16 भाग) | नागरी प्रचारिणी सभा | 1961 |
इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी
- यह फ्रेंच भाषा में लिखा गया।लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने ‘इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी ‘ ग्रंथ का हिंदी में अनुवाद किया जो 1952 में ‘हिंदुई साहित्य का इतिहास‘ नाम से प्रकाशित किया गया। गार्सा द तासी कभी भारत नहीं आए थे। इन्होंने कुल 738 कवियों का वर्णन किया जिनमें हिंदी के मात्र 72 कवि थे। गार्सा द तासी का झुकाव उर्दू की ओर था ।वे हिंदी को भद्दी बोली मानते थे। बाबू नवीनचंद्र ने जब उर्दू को आशिकी की जुबान की संज्ञा दी, तब पेरिस में बैठे तासी बहुत चढ़े थे। इन्होंने काल विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया।
शिवसिंह सरोज
- यह विशुद्ध हिंदी कवियों एवं रचनाकारों की बात करने वाला हिंदी भाषा में लिखा गया पहला इतिहास ग्रंथ है। शिव सिंह सेंगर ने हिंदी साहित्य का प्रारंभ 713 ईसवी से स्वीकार किया है। इन्होंने पुष्पदंत को हिंदी का पहला कवि माना है। रामचंद्र शुक्ल जी ने इनके इतिहास ग्रंथ को इतिवृत्त संग्रह की संज्ञा दी है।
द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ नॉर्दन हिंदुस्तान
- जॉर्ज ग्रियर्सन आयरलैंड के निवासी थे । यह ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में है। कालानुक्रम पद्धति में लिखा गया यह प्रथम हिंदी साहित्य का इतिहास ग्रंथ है। किशोरी लाल गुप्त ने इस ग्रंथ का हिंदी अनुवाद ‘हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास ‘ नाम से किया है। यह ग्रंथ कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ था। इसमें प्रथम बार कलक्रम का विभाजन एवं नामकरण का प्रयास किया गया था। इसमें 12 कालखंड बताए गए। ग्रियर्सन ने 643 ईसवी से हिंदी साहित्य के प्रारंभ को स्वीकारा है। इन्होंने आदिकाल को चारण काल कहा। ग्रियर्सन ने भक्ति आंदोलन को धार्मिक पुनर्जागरण की संज्ञा देते हुए इसे हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल घोषित किया। यह भक्ति आंदोलन को बिजली की भांति त्वरित उदित मानते हैं। रीति शब्द का प्रयोग ग्रियर्सन ने ही किया। रीतिकाल को इन्होंने रीति काव्य की संज्ञा दी।
मिश्रबंधु विनोद
- मिश्र बंधु तीन भाई थे – गणेश बिहारी, श्याम बिहारी और सुखदेव बिहारी मिश्र। यह इतिहास ग्रंथ चार खंडों में लिखा गया। तथा इसमें आठ उपखंड है। एक ही काल को दो भागों में विभाजित करने की पद्धति का प्रचलन इन्होंने किया। मिश्र बंधु विनोद में 5000 हिंदी कवियों का वर्णन है। रामचंद्र शुक्ल जी ने अन्य इतिहास ग्रंथों को इतिवृत्त संग्रह की संज्ञा दी है , लेकिन मित्रबंधु विनोद को महावृत्त संग्रह की संज्ञा दी है। मिश्र बंधुओं के प्रिय कवि देव है।
रामचंद्र शुक्ल- “कवियों के परिचयात्मक विवरण मैंने प्रायः मित्र बंधु विनोद से ही लिए हैं।”
हिंदी साहित्य का इतिहास - रामचंद्र शुक्ल
- यह ग्रंथ काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 1929 में प्रकाशित हुआ। यह ग्रंथ ‘हिंदी शब्द सागर‘ की भूमिका के रूप में लिखा गया था । प्रारंभ में यह ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का विकास‘ नाम से लिखा गया था। यह विधेयवादी पद्धति में लिखा गया प्रथम इतिहास ग्रंथ था। इसे हिंदी साहित्य का प्रथम वैज्ञानिक इतिहास कहा जाता है। शुक्ला जी की इतिहास दृष्टि भारतीय रसवाद एवं लोक मंगल की अवधारणा पर केंद्रित रही है। रामचंद्र शुक्ल जी अपनी यथार्थवादी दृष्टि के कारण काव्य में रहस्यवाद का विरोध करते हैं। इसीलिए वे नाथ-सिद्धों के साहित्य को विशुद्ध काव्य कोटि में स्वीकार नहीं करते हैं। इस ग्रंथ में लगभग 1000 रचनाकारों का वर्णन है। शुक्ला जी ने एक कालखंड के दोहरे नामकरण की परंपरा को जन्म दिया।
हिंदी साहित्य की भूमिका, हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास
- शुक्ल जी सिद्धनाथ साहित्य को अस्वीकार कर देते हैं , किंतु द्विवेदी जी हिंदी साहित्य के विकास को सिद्ध – नाथों की परंपरा से जोड़कर देखते हैं।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी -“ अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का रूप बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।”
हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास
- यह इतिहास ग्रंथ भक्ति काल तक ही लिखा गया है।
हिंदी साहित्य का वृहद इतिहास(16 भाग)
- यह काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित हुआ था। यह ग्रंथ 18 खंडों में निकलना प्रस्तावित था किंतु इसके 16 खंड ही प्रकाशित हुए हैं।
- श्यामसुंदर दास ने 1893 ईस्वी में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की थी। इसके अध्यक्ष श्री राधाकृष्ण दास बनाए गए थे।
हिंदी साहित्य का काल विभाजन
- साहित्यिक प्रवृत्ति के आधार पर – जैसे छायावाद प्रगतिवाद आदि।
- साहित्यकार के आधार पर - जैसे भारतेंदु काल और द्विवेदी काल।
- ऐतिहासिक कालक्रम के आधार पर- आदिकाल , आधुनिक काल।
- हिंदी साहित्य के इतिहास में काल विभाजन एवं नामकरण का सर्व प्रथम प्रयास जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा किया गया। जिसमें 12 कालखंड सम्मिलित थे।
- मिश्र बंधुओं ने हिंदी साहित्य के इतिहास को पांच काल खंडों में विभाजित किया।
- रामचंद्र शुक्ल जी ने काल विभाजन करते समय उस काल की प्रमुख प्रवृत्तियों को ही आधार बनाया।रामचंद्र शुक्ल जी ने चार कालखंड बताएं –
- वीरगाथा काल(आदिकाल) वि.सं. 1050-1375
- पूर्वमध्य काल (भक्ति काल) वि.सं. 1375-1700
- उत्तरमध्य काल (रीतिकाल ) वि.सं. 1700-1900
- आधुनिक काल (गद्य काल) वि.सं. 1900 से अब तक
- रामकुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य के इतिहास के पांच कालखंड बताएं-संधि काल, चारण काल, भक्ति काल , रीतिकाल और आधुनिक काल। डॉ रामकुमार वर्मा ने आदिकाल के पूर्वार्ध को भाषा एवं साहित्य की दृष्टि से संधि काल नाम दिया तथा आदिकाल के उत्तरार्ध भाग को काव्य के रचनाकारों की दृष्टि से चारण काल नाम दिया है।
- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने चार कालखंड बताएं – आदिकाल, पूर्व मध्यकाल , उत्तर मध्यकाल और आधुनिक काल
- डॉ नगेंद्र ने हिंदी साहित्य के इतिहास को चार काल खंडों में बांटा-
- आदिकाल – (7वीं शती के मध्य से 14 वीं शती के मध्य तक।)
- भक्तिकाल – ( 14 वीं शती के मध्य से 17 वीं शती के मध्य तक ।)
- रीतिकाल - (17 वीं शती के मध्य से 19 वीं शती के मध्य तक।)
- आधुनिक काल – 19 वीं शती के मध्य से अब तक :
2.जागरणसुधारकाल ( द्विवेदीकाल) 1900 – 1918 ई.
3. छायावाद काल 1918 – 1938 ई.
4. छायावादोत्तरकाल
- आधुनिक काल का काल विभाजन
1. भारतेन्दु युग ( सन् 1843 से 1900) ।
2. द्विवेदी युग (सन् 1900 से 1918) ।
3. छायावादी युग ( सन् 1918 से 1938) ।
4. प्रगतिवादी युग (सन् 1938 से 1943 ) ।
5. प्रयोगवादी युग ( 1943 से 1952 )।
6. नई कविता ( 1952 से 1960) ।
7. साठोत्तरी कविता/ अकविता (1960-1975)
8. समकालीन कविता (1975- अब तक )
- आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने रीतिकाल को रीतिबद्ध , रीति सिद्ध एवं रीतिमुक्त तीन काव्य खंडों में बांटा।
- बाबू श्यामसुंदर दास ने आधुनिक काल को नवीन काल नाम दिया।
- रामचंद्र शुक्ल ने विक्रम संवत 1050 अर्थातएक 993 ई. हिंदी साहित्य का प्रारंभ वाला है।
- राहुल सांकृत्यायन ने 769ई. से हिंदी साहित्य का प्रारंभ माना है।
हिंदी साहित्य के प्रथम कवि संबंधी मत
- शिवसिंह सेंगर ने पुष्पदंत को प्रथम कवि माना ।
- रामचंद्र शुक्ल जी ने मुंज को हिंदी का प्रथम कवि माना है।
- हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अब्दुर्रहमान को प्रथम कवि माना।
- रामकुमार वर्मा ने स्वयंभू को हिंदी का प्रथम कवि माना।
- राहुल सांकृत्यायन ने सरहपा को प्रथम कवि माना।
- गणपति चंद्रगुप्त ने शालिभद्र सूरी को प्रथम हिंदी कवि माना है।
हिंदी साहित्य में प्रथम
- हिंदी के प्रथम कवि – सरहपा
- हिंदी के प्रथम महा कवि – चंदबरदाई
- खड़ी बोली हिंदी के प्रथम कवि -अमीर खुसरो
- खड़ी बोली हिंदी के प्रथम महाकवि-अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
- खड़ी बोली हिंदी का प्रथम महाकाव्य -प्रियप्रवास
- हिंदी का प्रथम महाकाव्य - पृथ्वीराज रासो