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हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की पद्धतियां
हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की चार पद्धतियां है जो निम्नानुसार है—
वर्णानुक्रम पद्धति
कालानुक्रमी पद्धति
वैज्ञानिक पद्धति
विधेयवादी पद्धति
1.वर्णानुक्रम पद्धति
यह हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की प्रथम पद्धति है ।इस पद्धति में रचनाकारों का विवरण उनके नाम के प्रथम वर्ण के क्रम से दिया जाता है।
गार्सा द तासी और शिवसिंह सोंगर ने इस पद्धति का प्रयोग किया
2.कालानुक्रमी पद्धति
साहित्य इतिहास लेखन की इस पद्धति में रचनाकारों का विवरण उनके काल अर्थात समय के क्रम से दिया जाता है।
जॉर्ज ग्रियर्सन तथा मिश्र बंधुओं ने इस पद्धति का प्रयोग किया।
3.वैज्ञानिक पद्धति
- हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की इस पद्धति में ग्रंथकार निरपेक्ष और तटस्थ रहकर तथ्य संकलित करके उसे क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करता है।
- गणपति चंद्र गुप्त द्वारा रचित हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक काल ग्रंथ को इस श्रेणी में रखा जा सकता है।
4.विधेयवादी पद्धति
इस पद्धति के प्रतिपादक फ्रेंच विद्वान तेन है।
तेन ने इस पद्धति को 3 शब्दों के द्वारा स्पष्ट किया है - जाति, वातावरण तथा क्षण विशेष ।
इस पद्धति के अंतर्गत साहित्य इतिहास को समझने के लिए उससे संबंधित जातीय परंपराओं, राष्ट्रीय और सामाजिक वातावरण तथा सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन विश्लेषण आवश्यक है।
इस पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग हिंदी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल जी के द्वारा किया गया। उनके पश्चात रामस्वरूप चतुर्वेदी , बच्चन सिंह आदि ने इस पद्धति को आगे बढ़ाया।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब होता है। …… आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उसका सामंजस्य बिठाना ही साहित्य कहलाता है।